सूनी दीवारों की तस्वीर आज भी आँखों में,
सन्नाटे की गूँज आज भी कानों में,
मिनटों को घंटों की शक्ल में देखा किये हम,
जब अकेले ही अकेलेपन से लड़ा किये हम
कोई अपना साथ न आया था,
पुकारा खूब पर जवाब न आया था,
रोज़ केवल अपने ही अक्स को देखा किये हम,
जब अकेले ही अकेलेपन से लड़ा किये हम
आवाज़ अपनी दीवारों से टकराई और लौट आई,
हलकी सी आहट भी बेचैनी का सबब लायी,
किसी के आने का इंतज़ार किये हम,
जब अकेले ही अकेलेपन से लड़ा किये हम
गैरों में अपनों की शक्लों को ढूंडा,
शायद ख़्वाबों में मिलो, सो आँखों को मूंदा,
एक रोज़ आओगे ज़रूर, यह विश्वास लिए हम,
अकेले ही अकेलेपन से लड़ा किये हम
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